शनिवार, 23 जनवरी 2016

कविता - मैं और तुम 

बरसात हुई थी 
फूल खिले थे 
जब हम मिले थे ।

कोयल बोली थी
मोर नाचे थे 
जब हम मिले थे ।

कस्मे खाई थी 
वादे किए थे 
जब हम मिले थे ।

फिर....

कमरा बांटा
किचन बांटा 
सपने बांटे 
बर्तन बांटे 
बिजलियाँ कड़की 
बादल गरजे .
और फिर 
..जिंदगी खत्म ।



शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

गांव के रास्ते - टेढ़े और सस्ते - 1

गांव " शब्द सुनते ही मन में एक ही विचार आता है - पिछड़ा स्थान । कच्चे घर , दुबले शरीर , अनपढ़ लोग , पशुओ की दुर्गन्ध । यहीं सब आएगा न आपके मन में या आपके पवित्र विचारों में । तो आप बिल्कुल भी सही नहीं हैं , हाँ यह सच है गांव बदल चुके हैं ।

लेकिन गांव में आज भी शांति और सम्रद्धि हैं , गांव में आज भी सभ्य प्रेम रहता हैं , गांव में आज भी सुंदरता बसती हैं , गोधूलि शाम भी ऐसे ही होती है और छोटे - छोटे त्यौहार भी बड़प्पन से मनाएं जाते हैं , कोई बैर भाव नहीं , केवल  सद्भाव । गांव के लोगों ने ऐसे मुखोटे नहीं पहन रखे  हैं जिससे शहरी लोगों ने अपने मुँह को ढँक रखा हैं । दिखावा इन्हें नहीं आता ,  जैसे दिखते हैं अंदर से भी वैसे  ही  हैं । इन्हें तो बस प्यार जताना आता है ,
यहाँ बड़ा हॉस्पिटल नहीं है ..क्योंकि यहाँ के लोगों को इसकी जरुरत ही नहीं पड़ती । यहाँ एअरपोर्ट भी नहीं है क्योंकि यहाँ के लोगों के पास खूब सारा समय है । सुविधाओं के नाम पर यहां - बड़े बड़े खेत है जहां खूब अनाज उगाया जाता है । गाय और भैस का शुद्ध दूध है । जैविक तरीके से उगाई गई सब्जियां है । बावड़ी से निकाला गया शुद्ध ,पवित्र और मीठा पानी हैं । एक छोटा स्कुल है जहां बच्चे मन लगाकर पढ़ते है । छोटे - छोटे मंदिर है कई सारे । बहुत सारे पेड़ - पौधे । 

आगे जारी है ....

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

स्त्री

 कविता

  स्त्री

हे भगवान , मुझे इतना सुन्दर क्यों बनाया , ठीक पर
घूँघट की आड़ में चेहरे पर पहरा क्यों लगाया ।

काली जुल्फे , होठों का रंग गुलाबी क्यों बनाया , ठीक पर
महलों , बंगलो में रहने वाला
खुद को कहता पुरुष ,
ऐसा जानवर क्यों बनाया ।

झाड़ू , बर्तन , लकड़ी लाना मेरा भाग्य बनाया , ठीक पर
जिसको पीकर रोज पीटता
इस द्रव क्यों बनाया ।



कविता - तुम्हारा शहर


कविता - तुम्हारा शहर 
क्यों इतराती हो इतना 
अपने उस डरावने शहर पर 
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना 

काला धुँआ , काले दिल के लोग 
जहरीला पानी , जहरीले लोग 
कानों को कड़वी लगती आवाज 
ना बोलने , ना बुलाने का रिवाज 
फिर भी ऐसे शहर पर 
क्यों इतराती हो इतना 
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना 

हाथ में कटोरा , सड़क पर बच्चे 
निकली अन्तड़िया , भूखे बच्चे 
ना दया , दानव ही दानव 
मानव को मारता मानव ही मानव 
विशालकाय इमारतों में
दबती , चीखती आवाजे 
आजादी रोकते निष्ठुर दरवाजे 
फिर भी ऐसे शहर पर 
क्यों इतराती हो इतना 
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना 

गोरे रंग का ओढ़े लिबास 
काम करते सारे बेकार 
चारों तरफ दौड़ती निर्जीव गाड़ी 
साथ में दोडता निर्जीव मानव 
ना रिश्ते ना नाते बस भाग - भाग
फिर भी ऐसे शहर पर 
क्यों इतराती हो इतना 
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना 
अपने इस भीमकाय शहर पर 

शांति ना शीतलता , आग ही आग 
प्यार ना पवित्रता , पाप ही पाप
मृगमरीचिका सा तुम्हारा शहर 
काल की कोठरी तुम्हारा शहर 
फिर भी ऐसे शहर पर
क्यों इतराती ही इतना 
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना ।

कभी आओं मेरे साथ 
चलों मेरे गांव 
दिखाऊंगा तुम्हे गोधूलि की शाम 
बच्चों की टोली , रंगो की होली 
कोयल की बोली , बाजरे की रोटी 
कभी आओं मेरे साथ 
चलो मेरे गांव 

खेतों में फसल , घर में प्यार 
रिश्तों में सम्मान 
सडक पर बैलगाड़ी 
जीवन में साथी 
वो सब जो तुमने 
पढ़ा हैं अपनी किताब में 
कभी आओं मेरे साथ 
चलों मेरे गांव ।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

अंतहीन सीरिया

कविता - अंतहीन सीरिया

बस अब कुछ नहीं बचा हैं
बची हैं तो यह अँधेरी ख़ामोशी 
घरों के मलबे ,
हवा में घुली बारूद की सुगंध ,
और लाल रंग से रंगी टूटी दीवारे ।

टैंको की आवाज ने दबा दिया है ,
छोटे बच्चों के पैरों की थाप को ।
गिद्धों की क्रूर निगाह ,
ढुढ़तीं हैं मरे हुए इंसानी जिस्म को ।
और
हर रोज दावत मनाते हैं ,
काला रंग ओढे इंसानी भेड़िये ।

बाकी रह गया हैं वो पुरानी 
यादों का बादल ,
वो पलाश के लाल फूल , 
अमरुद के पेड़ के मीठे फल 
जो उसने बड़ी मिन्नतों से
उगाए थे, घर के दालान में ।

सुनहरा " सीरिया " बन गया है
काले धुंए से घिरी एक फैक्ट्री 
जहां होता है हर दिन ,
हजारों इंसानों का कत्ल ।

सीरिया अब तो हो जाओं 
शांत...शांत ...शांत 
गहरी शांति के साथ ।

Copyright@अभिमन्यु सिंह चारण

(सीरिया के लोगों को समर्पित )

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

कुछ शेर

बारिश में पढ़ना बहुत अच्छा लगता हैं 
तुम साथ हो तो संवरना अच्छा लगता हैं

बिछड़ गए सपने जो उस रात हमने देखे थे ,
तूफान कितने भी आये बस लड़ना अच्छा लगता हैं ।

दिखने को तो हम भी बादशाह है ईमानदारी के 
पर हाथ आये रिश्वत तो खर्च करना अच्छा लगता हैं ।

कौन कहता हैं हमें रंजिशें पसंद नहीं , 
सामने आये दुश्मन तो मरना अच्छा लगता हैं ।

हर बार गिराया हमें अँधेरे बाजारों में 
पर , चाँद तो अंधेरों में  ही अच्छा लगता हैं ।

हम गुलाम बन गए एक दिन ईमानदारी के 
ऐसी गुलामी में अब जीना अच्छा लगता हैं ।

रातों में घूमना , बिसरना छोड़ दिया हैं 
जब से वो मिले है हमने पीना छोड़ दिया है ।

माँ हर रोज पूछती हैं , क्या खायेगा तूँ 
हमने कहा तेरे हाथ का सुखा निवाला अच्छा लगता हैं ।

बहिन राह तकती रही , भाई के लौट आने की
पर वो तो तिरंगे में लिपटा ही अच्छा लगता है ।

वो चले गए हमें छोड़ कर बीच रास्ते यूँ ही 
बस अब तो ख्वाबों जीना ही अच्छा लगता हैं ।

अभिमन्यु सिंह फैदानी ।

एक छोटी लड़की

एक कविता :- वो छोटी लड़की

वो छोटी सी लड़की
जिसे मैं हर रोज
देखता हूँ ,
सामने वाली गली में
उन प्लास्टिक की थैलियों
के बीच ,
घर से फेंकी हुई
बेकार चीजों के बीच
कुछ ना कुछ खोजते हुए
उन्ही मैले - कुचले अध् फटे
कपड़ो में ।

एक बार जब मैंने झाँका
उसकी आँखों में
 मुझे दिखे ,
हजारों रंग बिरंगे सपने
तितली से प्यारे
हाथ में बस्ता लिए
पढ़ने के सपने
डॉक्टर बनने के सपने
आधे - अधूरे हजारो सपने

काश ! भारत जल्द स्मार्ट देश बने
उस छोटी सी लड़की के लिए ।

Copyright@ Abhimanyu singh