कविता
स्त्री
हे भगवान , मुझे इतना सुन्दर क्यों बनाया , ठीक पर
घूँघट की आड़ में चेहरे पर पहरा क्यों लगाया ।
काली जुल्फे , होठों का रंग गुलाबी क्यों बनाया , ठीक पर
महलों , बंगलो में रहने वाला
खुद को कहता पुरुष ,
ऐसा जानवर क्यों बनाया ।
झाड़ू , बर्तन , लकड़ी लाना मेरा भाग्य बनाया , ठीक पर
जिसको पीकर रोज पीटता
इस द्रव क्यों बनाया ।
शनिवार, 17 अक्टूबर 2015
कविता - तुम्हारा शहर
कविता - तुम्हारा शहर
क्यों इतराती हो इतना
अपने उस डरावने शहर पर
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना
काला धुँआ , काले दिल के लोग
जहरीला पानी , जहरीले लोग
कानों को कड़वी लगती आवाज
ना बोलने , ना बुलाने का रिवाज
फिर भी ऐसे शहर पर
क्यों इतराती हो इतना
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना
हाथ में कटोरा , सड़क पर बच्चे
निकली अन्तड़िया , भूखे बच्चे
ना दया , दानव ही दानव
मानव को मारता मानव ही मानव
विशालकाय इमारतों में
दबती , चीखती आवाजे
आजादी रोकते निष्ठुर दरवाजे
फिर भी ऐसे शहर पर
क्यों इतराती हो इतना
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना
गोरे रंग का ओढ़े लिबास
काम करते सारे बेकार
चारों तरफ दौड़ती निर्जीव गाड़ी
साथ में दोडता निर्जीव मानव
ना रिश्ते ना नाते बस भाग - भाग
फिर भी ऐसे शहर पर
क्यों इतराती हो इतना
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना
अपने इस भीमकाय शहर पर
शांति ना शीतलता , आग ही आग
प्यार ना पवित्रता , पाप ही पाप
मृगमरीचिका सा तुम्हारा शहर
काल की कोठरी तुम्हारा शहर
फिर भी ऐसे शहर पर
क्यों इतराती ही इतना
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना ।
कभी आओं मेरे साथ
चलों मेरे गांव
दिखाऊंगा तुम्हे गोधूलि की शाम
बच्चों की टोली , रंगो की होली
कोयल की बोली , बाजरे की रोटी
कभी आओं मेरे साथ
चलो मेरे गांव
खेतों में फसल , घर में प्यार
रिश्तों में सम्मान
सडक पर बैलगाड़ी
जीवन में साथी
वो सब जो तुमने
पढ़ा हैं अपनी किताब में
कभी आओं मेरे साथ
चलों मेरे गांव ।
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015
अंतहीन सीरिया
कविता - अंतहीन सीरिया
बस अब कुछ नहीं बचा हैं
बची हैं तो यह अँधेरी ख़ामोशी
घरों के मलबे ,
हवा में घुली बारूद की सुगंध ,
और लाल रंग से रंगी टूटी दीवारे ।
टैंको की आवाज ने दबा दिया है ,
छोटे बच्चों के पैरों की थाप को ।
गिद्धों की क्रूर निगाह ,
ढुढ़तीं हैं मरे हुए इंसानी जिस्म को ।
और
हर रोज दावत मनाते हैं ,
काला रंग ओढे इंसानी भेड़िये ।
बाकी रह गया हैं वो पुरानी
यादों का बादल ,
वो पलाश के लाल फूल ,
अमरुद के पेड़ के मीठे फल
जो उसने बड़ी मिन्नतों से
उगाए थे, घर के दालान में ।
सुनहरा " सीरिया " बन गया है
काले धुंए से घिरी एक फैक्ट्री
जहां होता है हर दिन ,
हजारों इंसानों का कत्ल ।
सीरिया अब तो हो जाओं
शांत...शांत ...शांत
गहरी शांति के साथ ।
Copyright@अभिमन्यु सिंह चारण
(सीरिया के लोगों को समर्पित )
बची हैं तो यह अँधेरी ख़ामोशी
घरों के मलबे ,
हवा में घुली बारूद की सुगंध ,
और लाल रंग से रंगी टूटी दीवारे ।
छोटे बच्चों के पैरों की थाप को ।
गिद्धों की क्रूर निगाह ,
ढुढ़तीं हैं मरे हुए इंसानी जिस्म को ।
और
हर रोज दावत मनाते हैं ,
काला रंग ओढे इंसानी भेड़िये ।
यादों का बादल ,
वो पलाश के लाल फूल ,
अमरुद के पेड़ के मीठे फल
जो उसने बड़ी मिन्नतों से
उगाए थे, घर के दालान में ।
काले धुंए से घिरी एक फैक्ट्री
जहां होता है हर दिन ,
हजारों इंसानों का कत्ल ।
शांत...शांत ...शांत
गहरी शांति के साथ ।
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015
कुछ शेर
बारिश में पढ़ना बहुत अच्छा लगता हैं
तुम साथ हो तो संवरना अच्छा लगता हैं
बिछड़ गए सपने जो उस रात हमने देखे थे ,
तूफान कितने भी आये बस लड़ना अच्छा लगता हैं ।
दिखने को तो हम भी बादशाह है ईमानदारी के
पर हाथ आये रिश्वत तो खर्च करना अच्छा लगता हैं ।
कौन कहता हैं हमें रंजिशें पसंद नहीं ,
सामने आये दुश्मन तो मरना अच्छा लगता हैं ।
हर बार गिराया हमें अँधेरे बाजारों में
पर , चाँद तो अंधेरों में ही अच्छा लगता हैं ।
हम गुलाम बन गए एक दिन ईमानदारी के
ऐसी गुलामी में अब जीना अच्छा लगता हैं ।
रातों में घूमना , बिसरना छोड़ दिया हैं
जब से वो मिले है हमने पीना छोड़ दिया है ।
माँ हर रोज पूछती हैं , क्या खायेगा तूँ
हमने कहा तेरे हाथ का सुखा निवाला अच्छा लगता हैं ।
बहिन राह तकती रही , भाई के लौट आने की
पर वो तो तिरंगे में लिपटा ही अच्छा लगता है ।
वो चले गए हमें छोड़ कर बीच रास्ते यूँ ही
बस अब तो ख्वाबों जीना ही अच्छा लगता हैं ।
अभिमन्यु सिंह फैदानी ।
तुम साथ हो तो संवरना अच्छा लगता हैं
तूफान कितने भी आये बस लड़ना अच्छा लगता हैं ।
पर हाथ आये रिश्वत तो खर्च करना अच्छा लगता हैं ।
सामने आये दुश्मन तो मरना अच्छा लगता हैं ।
पर , चाँद तो अंधेरों में ही अच्छा लगता हैं ।
ऐसी गुलामी में अब जीना अच्छा लगता हैं ।
जब से वो मिले है हमने पीना छोड़ दिया है ।
हमने कहा तेरे हाथ का सुखा निवाला अच्छा लगता हैं ।
पर वो तो तिरंगे में लिपटा ही अच्छा लगता है ।
बस अब तो ख्वाबों जीना ही अच्छा लगता हैं ।
एक छोटी लड़की
एक कविता :- वो छोटी लड़की
वो छोटी सी लड़की
जिसे मैं हर रोज
देखता हूँ ,
सामने वाली गली में
उन प्लास्टिक की थैलियों
के बीच ,
घर से फेंकी हुई
बेकार चीजों के बीच
कुछ ना कुछ खोजते हुए
उन्ही मैले - कुचले अध् फटे
कपड़ो में ।
एक बार जब मैंने झाँका
उसकी आँखों में
मुझे दिखे ,
हजारों रंग बिरंगे सपने
तितली से प्यारे
हाथ में बस्ता लिए
पढ़ने के सपने
डॉक्टर बनने के सपने
आधे - अधूरे हजारो सपने
काश ! भारत जल्द स्मार्ट देश बने
उस छोटी सी लड़की के लिए ।
Copyright@ Abhimanyu singh
वो छोटी सी लड़की
जिसे मैं हर रोज
देखता हूँ ,
सामने वाली गली में
उन प्लास्टिक की थैलियों
के बीच ,
घर से फेंकी हुई
बेकार चीजों के बीच
कुछ ना कुछ खोजते हुए
उन्ही मैले - कुचले अध् फटे
कपड़ो में ।
एक बार जब मैंने झाँका
उसकी आँखों में
मुझे दिखे ,
हजारों रंग बिरंगे सपने
तितली से प्यारे
हाथ में बस्ता लिए
पढ़ने के सपने
डॉक्टर बनने के सपने
आधे - अधूरे हजारो सपने
काश ! भारत जल्द स्मार्ट देश बने
उस छोटी सी लड़की के लिए ।
Copyright@ Abhimanyu singh
सदस्यता लें
संदेश (Atom)