कविता
स्त्री
हे भगवान , मुझे इतना सुन्दर क्यों बनाया , ठीक पर
घूँघट की आड़ में चेहरे पर पहरा क्यों लगाया ।
काली जुल्फे , होठों का रंग गुलाबी क्यों बनाया , ठीक पर
महलों , बंगलो में रहने वाला
खुद को कहता पुरुष ,
ऐसा जानवर क्यों बनाया ।
झाड़ू , बर्तन , लकड़ी लाना मेरा भाग्य बनाया , ठीक पर
जिसको पीकर रोज पीटता
इस द्रव क्यों बनाया ।
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