कविता - तुम्हारा शहर
क्यों इतराती हो इतना
अपने उस डरावने शहर पर
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना
काला धुँआ , काले दिल के लोग
जहरीला पानी , जहरीले लोग
कानों को कड़वी लगती आवाज
ना बोलने , ना बुलाने का रिवाज
फिर भी ऐसे शहर पर
क्यों इतराती हो इतना
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना
हाथ में कटोरा , सड़क पर बच्चे
निकली अन्तड़िया , भूखे बच्चे
ना दया , दानव ही दानव
मानव को मारता मानव ही मानव
विशालकाय इमारतों में
दबती , चीखती आवाजे
आजादी रोकते निष्ठुर दरवाजे
फिर भी ऐसे शहर पर
क्यों इतराती हो इतना
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना
गोरे रंग का ओढ़े लिबास
काम करते सारे बेकार
चारों तरफ दौड़ती निर्जीव गाड़ी
साथ में दोडता निर्जीव मानव
ना रिश्ते ना नाते बस भाग - भाग
फिर भी ऐसे शहर पर
क्यों इतराती हो इतना
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना
अपने इस भीमकाय शहर पर
शांति ना शीतलता , आग ही आग
प्यार ना पवित्रता , पाप ही पाप
मृगमरीचिका सा तुम्हारा शहर
काल की कोठरी तुम्हारा शहर
फिर भी ऐसे शहर पर
क्यों इतराती ही इतना
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना ।
कभी आओं मेरे साथ
चलों मेरे गांव
दिखाऊंगा तुम्हे गोधूलि की शाम
बच्चों की टोली , रंगो की होली
कोयल की बोली , बाजरे की रोटी
कभी आओं मेरे साथ
चलो मेरे गांव
खेतों में फसल , घर में प्यार
रिश्तों में सम्मान
सडक पर बैलगाड़ी
जीवन में साथी
वो सब जो तुमने
पढ़ा हैं अपनी किताब में
कभी आओं मेरे साथ
चलों मेरे गांव ।