बची हैं तो यह अँधेरी ख़ामोशी
घरों के मलबे ,
हवा में घुली बारूद की सुगंध ,
और लाल रंग से रंगी टूटी दीवारे ।
छोटे बच्चों के पैरों की थाप को ।
गिद्धों की क्रूर निगाह ,
ढुढ़तीं हैं मरे हुए इंसानी जिस्म को ।
और
हर रोज दावत मनाते हैं ,
काला रंग ओढे इंसानी भेड़िये ।
यादों का बादल ,
वो पलाश के लाल फूल ,
अमरुद के पेड़ के मीठे फल
जो उसने बड़ी मिन्नतों से
उगाए थे, घर के दालान में ।
काले धुंए से घिरी एक फैक्ट्री
जहां होता है हर दिन ,
हजारों इंसानों का कत्ल ।
शांत...शांत ...शांत
गहरी शांति के साथ ।
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