मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

अंतहीन सीरिया

कविता - अंतहीन सीरिया

बस अब कुछ नहीं बचा हैं
बची हैं तो यह अँधेरी ख़ामोशी 
घरों के मलबे ,
हवा में घुली बारूद की सुगंध ,
और लाल रंग से रंगी टूटी दीवारे ।

टैंको की आवाज ने दबा दिया है ,
छोटे बच्चों के पैरों की थाप को ।
गिद्धों की क्रूर निगाह ,
ढुढ़तीं हैं मरे हुए इंसानी जिस्म को ।
और
हर रोज दावत मनाते हैं ,
काला रंग ओढे इंसानी भेड़िये ।

बाकी रह गया हैं वो पुरानी 
यादों का बादल ,
वो पलाश के लाल फूल , 
अमरुद के पेड़ के मीठे फल 
जो उसने बड़ी मिन्नतों से
उगाए थे, घर के दालान में ।

सुनहरा " सीरिया " बन गया है
काले धुंए से घिरी एक फैक्ट्री 
जहां होता है हर दिन ,
हजारों इंसानों का कत्ल ।

सीरिया अब तो हो जाओं 
शांत...शांत ...शांत 
गहरी शांति के साथ ।

Copyright@अभिमन्यु सिंह चारण

(सीरिया के लोगों को समर्पित )

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