शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

कविता - तुम्हारा शहर


कविता - तुम्हारा शहर 
क्यों इतराती हो इतना 
अपने उस डरावने शहर पर 
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना 

काला धुँआ , काले दिल के लोग 
जहरीला पानी , जहरीले लोग 
कानों को कड़वी लगती आवाज 
ना बोलने , ना बुलाने का रिवाज 
फिर भी ऐसे शहर पर 
क्यों इतराती हो इतना 
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना 

हाथ में कटोरा , सड़क पर बच्चे 
निकली अन्तड़िया , भूखे बच्चे 
ना दया , दानव ही दानव 
मानव को मारता मानव ही मानव 
विशालकाय इमारतों में
दबती , चीखती आवाजे 
आजादी रोकते निष्ठुर दरवाजे 
फिर भी ऐसे शहर पर 
क्यों इतराती हो इतना 
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना 

गोरे रंग का ओढ़े लिबास 
काम करते सारे बेकार 
चारों तरफ दौड़ती निर्जीव गाड़ी 
साथ में दोडता निर्जीव मानव 
ना रिश्ते ना नाते बस भाग - भाग
फिर भी ऐसे शहर पर 
क्यों इतराती हो इतना 
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना 
अपने इस भीमकाय शहर पर 

शांति ना शीतलता , आग ही आग 
प्यार ना पवित्रता , पाप ही पाप
मृगमरीचिका सा तुम्हारा शहर 
काल की कोठरी तुम्हारा शहर 
फिर भी ऐसे शहर पर
क्यों इतराती ही इतना 
बोलों ना , क्यों इतराती हो इतना ।

कभी आओं मेरे साथ 
चलों मेरे गांव 
दिखाऊंगा तुम्हे गोधूलि की शाम 
बच्चों की टोली , रंगो की होली 
कोयल की बोली , बाजरे की रोटी 
कभी आओं मेरे साथ 
चलो मेरे गांव 

खेतों में फसल , घर में प्यार 
रिश्तों में सम्मान 
सडक पर बैलगाड़ी 
जीवन में साथी 
वो सब जो तुमने 
पढ़ा हैं अपनी किताब में 
कभी आओं मेरे साथ 
चलों मेरे गांव ।

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